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भारत के संविधान में मूल या मौलिक कर्तव्य कितने है | What is Fundamental Duties

भारत के संविधान में मूल या मौलिक कर्तव्य कितने है | What is Fundamental Duties  – भारत के संविधान में मुल कर्तव्य की चर्चा भाग 4 ( क ), अनुच्छेद – 51 ( क ) में किया गया है ।  अधिकार और कर्त्तव्य स्पष्टतः अन्तर्सम्बंधित एवं अविभाज्य होते हैं परन्तु, भारत के मूल संविधान में मात्र नागरिकों अधिकार एवं राज्य के कर्त्तव्यों (नीति निदेशक तत्व) को स्थान दिया गया था।

बाद में (1976 ई.) नागरिकों के मूल कर्त्तव्यों (Fundamental Duties) को संविधान में जोड़ा गया। सन् 2002 में एक अन्य मूल कर्त्तव्य को इस सूची में जोड़ा गया।

भारतीय संविधान में मूल कर्त्तव्यों को पूर्व सोवियत संघ (USSR) के संविधान से प्रभावित होकर सम्मिलित किया गया है।

प्रमुख लोकतांत्रिक देशों जैसे, अमेरिका, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी आदि के संविधान में नागरिकों के कर्त्तव्यों को विश्लेषित नहीं किया गया है।

संभवतः एकमात्र जापानी संविधान में नागरिकों के कर्त्तव्यों को रखा गया है। समाजवादी देशों ने अपने नागरिकों के मूल अधिकारों एवं कर्त्तव्यों को समान महत्व दिया है।

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स्वर्ण सिंह समिति की अनुशंसाएँ

1976 ई. में कांग्रेस पार्टी ने सरवार स्वर्ण सिंह समिति का गठन किया, जिसे राष्ट्रीय आपातकाल के (1975-77) दौरान मूल कर्त्तव्यों एवं उनकी आवश्यकता आदि के सम्बंध में संस्तुति देने के लिए गठित किया गया था। निम्न समिति ने अनुशंसा की, कि संविधान में मूल कर्त्तव्यों का एक उल्ि अलग भाग होना चाहिए। केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने इसे स्वीकारकरते हुए 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 को लागू किया।

इसके माध्यम से संविधान में एक नए भाग-AV (क) को जोड़ा गया। इस नये भाग में केवल एक अनुच्छेद 51 (क) था, जिसमें पहली बार नागरिकों के दस मूल कर्त्तव्यों का विशेष उल्लेख किया गया।

यद्यपि स्वर्ण सिंह समिति ने संविधान में आठ मूल कर्त्तव्यों को जोड़े जाने का सुझाव दिया था, लेकिन 42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) द्वारा 10 मूल कर्त्तव्यों को जोड़ा गया।

86 वे संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 के द्वारा 6-14 वर्ष की आयु तक के बच्चों को शिक्षा का अवसर प्रदान करना प्रत्येक माता-पिता का कर्तव्य निर्धारित किया गया। इस प्रकार वर्तमान में मूल कर्तव्यों की संख्या (11) है।

कर्त्तव्यों का क्रियान्वयन

42वें संशोधन द्वारा संविधान में जिन कर्त्तव्यों को सम्मिलित किया गया है, वे साविधिक कर्त्तव्य (Statutory Duties) हैं। उन कर्तव्यों के अनुपालन में विफल होने पर दण्ड का आरोपण करने के लिए संसद विधि द्वारा दण्ड का विधान करेगी।

इस प्रावधान की सफलता बहुत हद तक उस आधार पर निर्भर करेगी, जिस पर तथा जिन व्यक्तियों के ऊपर इन कर्तव्यों को लागू किया गया है।

मौलिक कर्त्तव्यों को परमादेश (Mandamus) द्वारा प्रभावी नहीं बनाया जा सकता है। परमादेश एक रिट (Writ) है, जिसे न्यायालय (मूल) अधिकारों का उल्लंघन होने पर जारी करते हैं। मौलिक कर्त्तव्य लोगों पर नैतिक उत्तरदायित्व आरोपित करते हैं। प्रशासन इसके लिए उत्तरदायी नहीं हो सकता है, जबकि स्टेिं प्रशासनिक अधिकारी के विरुद्ध जारी की जाती हैं।

मूल कर्त्तव्यों की विशेषताएं

निम्नलिखित बिंदुओं को मूल कर्त्तव्यों की विशेषताओं के संदर्भ में उल्लिखित किया जा सकता है

मौलिक कर्तव्यों में से कुछ कर्तव्य नैतिक हैं, तो कुछ नागरिक उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय ध्वज एवं राष्ट्रगान का आदर करना नागरिक कर्त्तव्य, जबकि स्वतंत्रता संग्राम के उच्च आदर्शों का सम्मान एक नैतिक कर्त्तव्य है।

2. ये मूल्य भारतीय परम्परा, पौराणिक कथाओं, धर्म एवं जीवन पद्धतियों से सम्बंधित है।

3.मूल कर्तव्य केवल नागरिकों के लिए है, न कि विदेशियों के लिए।

4. इनके उल्लंघन के विरुद्ध कोई कानूनी संस्तुति नहीं है, यद्यपि, संसद उपयुक्त विधान द्वारा इनके क्रियान्वयन के लिए स्वतंत्र है।

मूल कर्त्तव्यों की आलोचना

• संविधान के भाग IV ( क ) में मूल कर्त्तव्यों की आलोचना निम्नलिखित आधार पर की जाती है

1. कर्तव्यों की सूची पूर्ण नहीं है क्योंकि इनमें कुछ अन्य कर्तव्य जैसे- कर अदायगी, परिवार नियोजन, मतदान आदि शामिल नहीं हैं।

कर अदायगी (Tax Pay) के कर्त्तव्य को स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति मिली थी परन्तु इसे शामिल नहीं किया गया।

2. कुछ कर्त्तव्य अस्पष्ट एवं बहुअर्थी हैं, जिसे आम व्यक्ति को समझने में कठिनाई होती है। विभिन्न शब्दों की अलग-अलग व्याख्या हो सकती है। उदाहरण के लिए, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, उच्च आदर्श, सामासिक संस्कृति आदि।

3. आलोचकों का यह तर्क है कि संविधान के भाग IV में मूल कर्त्तव्य को शामिल करने से इनका मूल्य व महत्व कम होता है। उन्हें भाग तीन के बाद जोड़ा जाना चाहिए था, ताकि वे मूल अधिकारों के समकक्ष रहते।

मूल कर्त्तव्यों का महत्व

आलोचनाओं के बावजूद मूल कर्त्तव्यों के महत्व को निम्नलिखित दृष्टिकोण के आधार पर रेखांकित किया जा सकता है

1. मूल कर्त्तव्य समाज विरोधी एंव राष्ट्र विरोधी गतिविधियों, जैसे सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करने, राष्ट्र ध्वज को जलाने के खिलाफ चेतावनी के रूप में कार्य करते हैं।

2. नागरिक जब अपने अधिकारों का प्रयोग करते हैं, तब मूल कर्तव्य सचेतक के रूप में सेवा करते हैं। नागरिकों को अपने देश, अपने साथी नागरिकों और अपने समाज के प्रति अपने कर्तव्यों के सम्बंध में भी जानकारी रखनी चाहिए

3. मूल कर्त्तव्य नागरिकों के लिए प्ररेणा स्रोत हैं, जो नागरिकों में

ॐ अनुशासन और प्रतिबद्धता को बढ़ाते हैं। 4. मूल कर्त्तव्य, अदालतों को किसी विधि की संवैधानिक वैधता एवं उनके परीक्षण के सम्बंध में सहायक होते हैं।

इस प्रकार के प्रावधान की व्यवस्था की गई है कि किसी कानून की संवैधानिकता की दृष्टि से व्याख्या में यदि अदालत को यह प्रतीत होता है कि, मूल कर्तव्यों के सम्बंध में विधि के प्रश्न उठते हैं तो अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 (6 स्वतंत्रताओं) के संदर्भ में इन्हें तर्कसंगत माना जा सकता है और इस प्रकार ऐसी विधि को असवैधानिक होने से बचाया जा सकता है ।

भारत के संविधान में मूल या मौलिक कर्तव्य कितने है | What is Fundamental Duties

नागरिकों के लिए 11 मौलिक कर्तव्य

1. संविधान का पालन करें और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करें।

2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदशों को (हृदय) में संजोए रखें और उनका पालन करें।

3. भारत की संप्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखें।

4. देश को रक्षा करें और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करें।

5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करें, जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग आधारित सभी भेदभावों से परे हो। ऐसी प्रथाओं का त्याग करें, जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हैं।

6. हमारी सामासिक संस्कृति (Composite Culture) की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझें और उसका परिरक्षण करें।

7. (प्राकृतिक पर्यावरण को जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और “वन्य जीव हैं, की रक्षा करें और उसका संवर्द्धन करें तथा प्राणी मात्र के प्रति दयाभाव रखें।

8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण. मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करी

9. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें। 10. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत् प्रयास करें, जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न पर उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छू ले।

11. 6 वर्ष की आयु से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के माता-पिता और प्रतिपाल्य के संरक्षक, उन्हें शिक्षा के अवसर प्रदान करें। (इस कर्तव्य को संविधान के 86वें संशोधन अधिनियम, 2002 की धारा 4 द्वारा जोड़ा गया।)

विपक्ष ने संविधान में कांग्रेस सरकार द्वारा मूल कर्तव्यों को जोड़े जाने का संसद में कड़ा विरोध किया। यद्यपि, मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी जनता पार्टी की सरकार ने आपातकाल के बाद इन मूल कर्तव्यों को समाप्त नहीं किया।

नई सरकार 43वें संशोधन अधिनियम (1977 ) एवं 44वें संशोधन अधिनियम (1978) के द्वारा 42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) में अनेक परिवर्तन करना चाहती थी। यह परिलक्षित करता है, कि संविधान में मूल कर्तव्यों को जोड़ा जाना आवश्यक था। यह और अधिक स्पष्ट हो गया, जब वर्ष 2002 में 86वें संशोधन अधिनियम के द्वारा संविधान में एक और मूल कर्तव्य को जोड़ा गया।

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भारत के मूल अधिकार, निदेशक तत्त्व और मूल कर्तव्य

 

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